बड़वानी, 21 जनवरी 2026।
निमाड़ दस्तक न्यूज़ (ब्यूरो रिपोर्ट)
बड़वानी जिले के हजारों आदिवासी किसान और मजदूर आज अपनी अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर आए। जागृत आदिवासी दलित संगठन के नेतृत्व में बड़ी संख्या में एकजुट हुए आदिवासियों ने कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया। प्रदर्शनकारियों ने रोजगार गारंटी में कटौती, नागरिकता पर सवाल और बिजली-फसल के सही दाम न मिलने के विरोध में राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।
रोजगार गारंटी नहीं, यह पलायन की गारंटी है
संगठन के नेताओं ने ‘विकसित भारत ग्राम जी’ कानून को मजदूर विरोधी बताते हुए कहा कि सरकार न्यूनतम जरूरत 467 रुपये मानती है, जबकि नरेगा में मात्र 261 रुपये देकर बेगारी कराई जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोबाइल हाजिरी और आधार-केवाईसी के नाम पर मजदूरी रोकी जा रही है। 4 लाख 64 हजार करोड़ के कर्ज में डूबी सरकार मजदूरों का भुगतान समय पर नहीं कर पा रही है, जिससे आदिवासी पलायन को मजबूर हैं।
वोट के अधिकार और नागरिकता पर हमला
मतदाता सूची पुनः निरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए संगठन ने कहा कि पारदर्शी सर्वे के अभाव में जिंदा लोगों को मृत और मजदूरी पर बाहर गए लोगों को अनुपस्थित बताकर नाम काटे जा रहे हैं। आदिवासियों से अब जाति और निवास जैसे कागजात मांगे जा रहे हैं। संगठन ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से भी की है और इसे आदिवासियों की नागरिकता पर हमला बताया है।
किसानों की बदहाली: बिजली कटौती और फर्जी बिल
आदिवासी किसानों ने आरोप लगाया कि गेहूं की सिंचाई के समय उन्हें रात 2 बजे बिजली दी जा रही है, जबकि शहरों को 24 घंटे सप्लाई मिलती है। बिना मीटर रीडिंग के फर्जी बिजली बिल और अवैध वसूली का भी विरोध किया गया। पाटी जैसे क्षेत्रों में मंडी की सुविधा न होने से किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं।
जंगल और जमीन बचाने की हुंकार
आंदोलनकारियों ने सरकार द्वारा जंगलों को ठेके पर कंपनियों को देने की योजना का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि वन अधिकार कानून को ठंडे बस्ते में डालकर आदिवासियों को उजाड़ने की कोशिश की जा रही है। साथ ही पीएम किसान सम्मान निधि में महिला किसानों को हक न मिलने को महिला विरोधी फैसला बताया।
देशभर के संगठनों का मिला समर्थन
इस आंदोलन में केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल, हरियाणा और गुजरात के विभिन्न संगठनों ने भी हिस्सा लिया और आदिवासियों के मुद्दों के साथ एकजुटता दिखाई। आंदोलन का नेतृत्व हरसिंग जमरे, नासरी बाई निंगवाल और बलराम जमरे ने किया।




