बड़वानी, 06 जनवरी 2026।
नगर में विराजित परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के शिष्य श्रमण मुनि श्री प्रणुत सागर जी महाराज ने बड़वानी दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित किया। मुनि श्री ने कर्म सिद्धांतों और पारिवारिक संस्कारों पर प्रकाश डालते हुए समाज को धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
दादा-दादी ही देते हैं संस्कारों की विरासत
मुनि श्री ने संयुक्त परिवार के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि जिस घर में दादा-दादी होते हैं, वहां बच्चे स्वाभाविक रूप से धर्मात्मा बनते हैं। धर्म के बीजों का रोपण और संस्कारों को पोषित करने का कार्य दादा-दादी ही करते हैं। वे ही बच्चों का हाथ पकड़कर मंदिर लाते हैं और देव दर्शन कराते हैं, जिससे अगली पीढ़ी में धर्म जीवित रहता है।
कर्म फल से कोई नहीं बच सकता
धर्मसभा में मुनि श्री ने कहा कि आज हर व्यक्ति पुण्य का फल तो चाहता है, लेकिन पाप करने से बचता नहीं है। उन्होंने कर्मों की गति समझाते हुए बताया कि मनुष्य को जो भी प्राप्त होता है, वह उसके पुण्य का फल है। वर्तमान जीवन में शारीरिक कष्ट या अभाव हमारे पिछले जन्मों के अनजाने में किए गए पापों का परिणाम हो सकते हैं। कर्म उदय में आते ही हैं और अपना प्रभाव दिखाते हैं।
जैन कुल में जन्म लेना बड़े सौभाग्य की बात
मुनि श्री ने भक्तों से कहा कि आप अत्यंत भाग्यशाली हैं जो आपको मनुष्य पर्याय के साथ जैन कुल मिला है। इस कुल के कारण ही आपको भगवान का अभिषेक करने, साधु-संतों की सेवा करने और आहार व औषध दान देने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है। मुनि की संगति से जन्मों के पाप कटते हैं और आने वाला भव सुधर जाता है।
दान के द्रव्य का न हो दुरुपयोग
दान और आहार चर्या पर संदेश देते हुए मुनि श्री ने स्पष्ट कहा कि आप दान दें या न दें, लेकिन दान के द्रव्य का कभी दुरुपयोग न करें। इसी तरह मुनिराज को आहार दें या न दें, पर उनके आहार में कभी अंतराय (बाधा) उत्पन्न न करें। उन्होंने भगवान नेमीनाथ के पूर्वजों का दृष्टांत देते हुए बताया कि मुनि संगति से नरक जाने वाले जीव भी सुधर गए और उनके घर तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ।
अभिषेक और शांतिधारा के साथ आयोजन
धर्मसभा से पूर्व मंदिर जी में भगवान का अभिषेक और शांतिधारा संपन्न हुई। कार्यक्रम का संचालन और मंगलाचरण इंदौर के नगर पुरोहित पंडित नितिन झांझरी द्वारा किया गया। उक्त जानकारी मनीष जैन द्वारा प्रदान की गई।




